Moral Stories In Hindi

 Moral Stories In Hindi

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सच्ची सेवा क्या होती है, What does true service occur


एक बार दो पड़ोसी राज्यों में युद्ध छिड़ गया। बहुत भयानक युद्ध चल रहा था।

युद्ध में बहुत सारे सैनिक घायल हो जाते थे। दोनों राज्यों की सेना में ऐसी कर्मचारी भर्ती किए गए थे जिनका काम था युद्धस्थल पर जाकर अपनी-अपनी सेना के घायल सैनिकों की मरहम-पट्टी करना और उन्हें पानी पिलाना 

उनमें से एक राज्य की सेना का एक कर्मचारी था पंडवरण युद्धस्थल पर जाता और घायल सैनिकों को पानी पिलाता और उनकी मरहम-पट्टी करता।

उसे जो भी घायल सैनिक नजर आता चाहे वह उसकी अपनी सेना का हो या विरोधी राज्य की सेना का हो, उसकी सेवा करता।

इस बात पर कुछ सैनिक ने राजा को शिकायत की कि पंडवरण विरोधी राज्य के घायल सैनिकों को भी मरहम-पट्टी करता और उन्हें पानी पिलाता है।

राजा ने उसे तुरंत बुलाया और उससे पूछा - पंडवरण तुम्हें घायल सैनिक की सेवा के लिए रखा गया है, किन्तु तुम तो विरोधी राज्य के सेना के घायल सैनिकों को भी सेवा कर रहे हो। ऐसा क्यों ?

पंडवरण बोला - महाराज मेरा कर्म है कि मैं घायलों की सेवा करूं। मैं जब युद्ध स्थल पर जाता हूँ तो मुझे सिर्फ दर्द से कहारते घायल मानव नजर आते हैं। मुझे उनमें अपना या विरोधी नजर नहीं आता है। मुझे सिर्फ अपना कर्म याद रहता है इसलिए मैं हर घायल की सेवा करता हूँ।

पंडवरण की बात सुनकर राजा ने उसे गले से लगा लिया और कहा - पंडवरण तुम सच्चे सेवक हो।

कथा का सार यह है कि सेवा अपने या पराए को देखकर नहीं की जाती। जिस सेवा में पक्षपात हो वह सेवा नहीं होती।

संपूर्ण मानव जाती की एक दृष्टि से सेवा ही सच्ची सेवा है। वह सहज दयावश और मानवता के नाते की जानी चाहिए


 लालची दूधवाला, Greedy milkman


एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में रवि नाम का एक दूधवाला रहता था। वह अपने लालची स्वभाव के लिए जाना जाता था। उसके पास एक गाय थी जो पूरे गांव में सबसे स्वादिष्ट और अधिक मात्रा में दूध दे दी थी। हर सुबह वह दूध निकालता और गांव के लोगों तक पहुंचाता था।
एक दिन रवि को यह एहसास हुआ कि गांव वालों को उसके गाय का दूध बहुत पसंद आ रहा है। इस बात से उसे बहुत खुशी होती है और उसके लालची दिमाग में एक उपाय आता है। वह सोचता है कि “अगर मैं दूध में पानी मिला दूं तो मैं अपना मुनाफा बढ़ा सकता हूं और किसी को पता भी नहीं चलेगा।”
उस दिन के बाद से रवि गांव वालों को दूध पहुंचाने से पहले उसमें पानी मिला देता था। उसे लगने लगा था कि वह बहुत चालाक हो गया है और उसके इस काम के बारे में किसी को नहीं पता चलेगा। फिर भी, गांव वालों को दूध के स्वाद में बदलाव नजर आता है क्योंकि उसका स्वाद अब पहले जैसा नहीं था।
जल्द ही, रवि के दूध में पानी मिलाने की खबर पूरे गांव में फैल जाती है। लोग शिकायत करने लगते हैं और उसके दूध का बहिष्कार करते हैं। लोगों को बहुत गुस्सा आता है क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्होंने जिस पर भरोसा किया उसी ने उनके साथ धोखा किया है।
रवि के गलत काम की वजह से उसका धंधा नीचे गिरने लगता है। उसे अपनी गलती का एहसास होता है, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसकी गांव वालों की नजर में जो इज्जत थी वह खत्म हो चुकी थी। गांव वाले अब उस पर भरोसा नहीं कर सकते थे और उसका दूध लेने से मना करने लगे।


अपने किए पर शर्मिंदा होकर रवि ने फैसला किया कि वह अपने काम करने के तरीके बदलेगा। उसने कसम खा ली कि वह एक ईमानदार व्यापारी बनेगा और गांव वालों का भरोसा वापस जीतेगा। रवि ने फिर से गाओं वालों को शुद्ध और बिना मिलावट के दूध देना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे गांव वालों को रवि के काम करने के तरीके में बदलाव नजर आया और उसकी तारीफ करने लगे। उन्होंने उसे माफ कर दिया और फिर से उससे दूध लेना शुरू कर दिया। रवि ने ईमानदारी के महत्व और लालच के परिणामों के बारे में एक जरुरी सबक सीखा।
उस दिन के बाद से रवि एक ईमानदार दूधवाले के नाम से जाना जाने लगा। उसे उसकी खोई हुई इज्जत और गांव वालों का भरोसा वापस मिल गया। उसका धंधा फिर से चलने लगा। उसे समझ आ गया कि असली सफलता, ईमानदार होने और ईमानदारी से दूसरों की सेवा करने से आती है।


“लालच से अस्थायी लाभ हो सकता है, लेकिन यह अंततः भरोसे को खत्म कर देता है। हालाँकि, ईमानदारी और निष्ठा लंबे समय तक चलने वाली सफलता और सम्मान की कुंजी है।”



एक बुद्धिमान व्यक्ति, A wise man

अक्सर चीजे हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वे हैं, बल्कि वैसी दिखती हैं जैसे हम हैं ।
यह एक ऐसे बुद्धिमान वयक्ति की कहानी है जो अपने गाँव के बाहर बैठा हुआ था। एक यात्री उधर से गुजरा और उसने उस व्यक्ति से पूछा, इस गाँव में किस तरह के लोग रहते हैं क्योंकि मैं अपना गाँव छोड़ कर किसी और गाँव में बसने की सोच रहा हूँ।


तब उस बुद्धिमान व्यक्ति ने पूछा, तुम जिस गाँव को छोड़ना चाहते हो, उस गाँव में कैसे लोग रहते हैं ?
उस आदमी ने कहा, वे स्वार्थी, निर्दयी और रूखे हैं।
बुद्धिमान व्यक्ति ने जवाब दिया इस गाँव में भी ऐसे ही लोग रहते हैं।
कुछ समय बाद एक दूसरा यात्री वहाँ आया और उसने उस बुद्धिमान व्यक्ति से व्ही सवाल पूछा। बुद्धिमान व्यक्ति ने उससे भी पूछा, तुम जिस गाँव को छोड़ना चाहते हो, उस गाँव में कैसे लोग रहते हैं ?
उस यात्री ने जवाब दिया, वहाँ के लोग विनम्र, दयालु और एक-दूसरे की मदद करने वाले हैं। तब बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा, इस गाँव में भी तुम्हें ऐसे ही लोग मिलेंगे।
आम तौर पर हम दुनिया को उस तरह नहीं देखते जैसी वह है बल्कि जैसे हम खुद है वैसी देखते है।


इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि -ज्यादातर मामलों में दूसरे लोगों का व्यवहार हमारे ही व्यवहार का आईना होता है।
अगर हमारी नीयत अच्छी होती है तो हम दूसरों की नीयत भी अच्छी मान लेते हैं। हमारा इरादा बुरा होता है तो हम दूसरों के इरादों को भी बुरा मान लेते हैं।


लालच करना बुरी बात है, Greed is bad thing to do

हम सभी लालची राजा मिदास की कहानी जानते हैं। उसके पास सोने की कमी नहीं थी, लेकिन सोना जितना बढ़ता वह और अधिक सोना चाहता।
उसने सोने को खजाने में जमकर लिया था और हर रोज उसे गिना करता था।


एक दिन जब वह सोना गिन रहा था तो एक अजनबी कहीं से आया और बोला, तुम मुझसे ऐसा कोई वरदान मांग सकते हो जो तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा ख़ुशी दे।
राजा खुश हुआ और उसने कहा मैं चाहता हूँ कि जिस चीज को छुऊँ, वह सोना बन जाए। अजनबी ने राजा से पूछा क्या तुम सचमुच यही चाहते हो ?
राजा ने कहा हाँ, तो अजनबी बोला कल सूरज की पहली किरण के साथ ही तुम्हें किसी चीज को छूकर सोना बना देने की ताकत मिल जाएगी। राजा ने सोचा कि वह सपना देख होगा, यह सच नहीं हो सकता। अगले दिन जब राजा नींद से उठा तो उसने अपना पलंग छुआ और वह सोना बन गया। वह वरदान सच था।
राजा ने जिस चीज को छुआ, वह सोना बन गई। उन्होंने खिड़की के बाहर देखा और अपनी नन्हीं बच्ची को खेलते पाया। उसने अपनी बिटिया को यह अजूबा दिखाना चाहा और सोचा कि वह खुश होगी। लेकिन बगीचे में जाने से पहले उसने एक किताब पढ़ने की सोची। उसने जैसे ही उसे छुआ, वह सोने की बन गई।


वह किताब को पढ़ न सका। फिर वह नाश्ता करने बैठा, जैसे ही उसने फलों और पानी के गिलास को छुआ, वे भी सोने के बन गए। उसकी भूख बढ़ने लगी और वह खुद से बोला। मैं सोने को खा और पी नहीं सकता।
ठीक उसी समय उसकी बेटी दौड़ती हुई वहाँ आई और उसने उसे बाँहों में भर लिया। वह सोने की मूर्ति बन गई। अब राजा के चेहरे से खुशी गायब हो गई।
राजा सर पकड़ कर रोने लगा। वह वरदान देने वाली अजनबी फिर आया और उसने राजा से पूछा कि क्या वह हर चीज को सोना बना देने की अपनी ताकत से खुश है ?
राजा ने बताया की वह दुनिया के सबसे दुखी इंसान है।
राजा ने उसे सारी बात बताई। अजनबी ने पूछा, अब तुम क्या पसंद करोगे, अपना भोजन और प्यारी बिटिया या सोने के ढेर और बिटिया की सोने की मूर्ति। राजा ने गिड़गिड़ाकर माफ़ी मांगी और कहा, मैं अपना सारा सोना छोड़ दूंगा मेहरबानी कर के मेरी बेटी मुझे लौटा दो क्योंकि उसके बिना मेरी हर चीज मूल्यहीन हो गई है।
अजनबी ने राजा से कहा तुम पहले से बुद्धिमान हो गए हो और उसने अपने वरदान को वापिस ले लिया। राजा को अपनी बेटी वापस फिर से मिल गई और उसे एक ऐसी सीख मिली जिसे वह जिंदगी-भर नहीं भुला सका।






लालची बहू, Greedy daughter-in-law


एक समय की बात है एक छोटे से गांव में राम और सीता नाम के कपल रहते थे। उनका एक अर्जुन नाम का बेटा था, जिसकी शादी रिया नाम की लड़की से हुई थी।
राम और सीता कड़ी मेहनत करते थे और अपने बुढ़ापे के लिए पैसे बचा थे। रिया बहुत लालची लड़की थी और हमेशा अपने लिए और चीजें चाहती थी।


जैसे-जैसे साल बीतता गया, रिया का लालच और बढ़ता गया। वह अपने पास रखे चीजों से कभी संतुष्ट नहीं रहती थी। वह हमेशा अपने सास-ससुर से महंगे तोहफे मांगा करती थी और उनके बचाये हुए पैसों में से भी कुछ हिस्सा अपने लिए मांगती थी।
राम और सीता बहुत ही अच्छे पेरेंट्स थे, इसलिए उसकी सारी जरूरतों को पूरा करते थे ताकि परिवार में शांति बनी रहे। वह अपने पति अर्जुन के ऊपर भी दबाव डालती थी, कि वह अपने मां बाप से पैसे और संपत्ति मांगे। वह बहुत ज्यादा संपत्ति कट्ठा करना चाहती थी, बिना किसी मेहनत के।
एक दिन राम और सीता ने यह फैसला लिया कि वह रिया को सबक सिखाएंगे। वह उसे बुलाते हैं और बोलते हैं की “बेटा हमें तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी है। हमने यह फैसला लिया है कि हम अपनी जायदाद का कुछ हिस्सा अपने बच्चों में बाटेंगे और उसका कुछ हिस्सा तुम्हे भी देना चाहते हैं.” रिया ख़ुशी से झूम उठती है क्योंकि वह हमेशा से यही चाहती थी।


लेकिन राम और सीता के मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने एक पत्थरों से भरा हुआ बैग उसे दे दिया और बोला, बेटी यह तुम्हारे हिस्से की संपत्ति है।
रिया उस बैग को देखकर गुस्सा हो गई। उसने उस पत्थर से भरे हुए बैग को जमीन पर फेंका और जोर से चिल्लाते हुए बोली कि, ” मेरी मजाक उड़ाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। मुझे पैसे चाहिए, ये पत्थर नहीं। ”
राम और सीता ने शांत तरीके से उसे समझाया और बोले “रिया, सच्ची संपत्ति सिर्फ पैसे और चीजों के बारे में नहीं है। यह प्यार, दया और जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसके लिए आभारी होने के बारे में है। हमने हमेशा तुमसे प्यार किया है और तुम्हारी देखभाल की है, और यह पैसों से भी अधिक कीमती है.”


रिया को एहसास हुआ कि वह लालच में कितनी अंधी हो गई थी। उसको अपने किये गए बर्ताव के लिए पछतावा होने लगता है। उसने अपने सास और ससुर से माफ़ी मांगी और अपने तरीके बदलने का वादा किया।
उस दिन के बाद से उसमें बदलाव आया और वह एक अच्छी बहू बन गई। रिया के बदलाव की बात पूरे गाँव में फैल गई और सभी ने एक बेहतर इंसान बनने के लिए उसकी प्रशंसा की।
रिया अपने परिवार का ख्याल रखते हुए और उनके बीच मिले प्यार के लिए आभारी होकर हमेशा खुश रहने लगी।
“सच्चा धन प्यार, दया और जो हमारे पास है उसके लिए आभारी होने से आता है, न कि हमेशा और अधिक चीजों की चाह रखने से।”





जादुई संतरा, Magic orange
एक समय की बात है, एक गांव में सोनू नाम का एक छोटा सा लड़का रहता था। उसे घूमने फिरने का और नई चीजें जानने का बड़ा शौक था। एक दिन जब वह जंगल में घूम रहा था, तो उसे एक संतरे का जादुई पेड़ दिखाई देता है।

वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग दिख रहा था। जब सोनू एक संतरे को चखता है, तो उसे अपने अंदर भरपूर ऊर्जा महसूस होती है और उसका दिमाग पहले से बहुत तेज हो जाता है।


सोनू उस जादुई संतरे का इस्तेमाल अपने खुद के फायदे के लिए करने लगा। उसे हर चीज पहले ही पता चल जाता और हर कठिन से कठिन प्रश्नों को हल कर लेता था। दूर-दूर से लोग उसकी इस प्रतिभा को देखने आते थे

जैसे-जैसे समय बीतता गया सोनू की शक्तियां कम होती गई। पेड़ पर संतरों की चमक भी कम हो रही थी और धीरे-धीरे उनकी भी शक्तियां खत्म होने लगी थी।

जल्दी ही सोनू को यह एहसास होता है कि, वह अपनी खुद की प्रतिभा को नजरअंदाज करते हुए जादुई संतरे की शक्ति पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है।

सोनू को अपनी गलतियों का एहसास होता है और वह जादुई संतरे के पेड़ के पास वापस जाता है। वह अपने लालची स्वभाव के लिए माफी मांगता है और वादा करता है कि अपनी काबिलियत का उपयोग वह अच्छे कामों के लिए करेगा। फिर अचानक से पेड़ के बचे हुए संतरों में वापस चमक आ जाती है।



मैना का विश्वास, U trust of myna


बरसात का मौसम था आसमान में घने बादल छाए हुए थे। नीम के एक पेड़ पर ढेर सारे कौवे काए काय करते हुए इधर से उधर घूम रहे थे और अपना बसेरा ढूंढ रहे थे।
क्योंकि वे जानते थे कि थोड़ी ही देर में बारिश होने वाली है तभी वह एक छोटी सी मैना आ जाती है सभी कौवे उस पर टूट पड़ते हैं और उस बेचारी मैना को नीम के पेड़ में से चले जाने को कहते हैं।


मैना उन सब से हाथ जोड़कर विनती करती है कि वह आज रात उसे इसी पेड़ में विश्राम करने दें क्योंकि बारिश होने वाली है और अंधेरा भी हो गया है। मुझे अपना घोंसला भी नहीं मिल रहा यह मैना कहती है। कौवे बहुत निर्दई थे।
वह मैना से कहते हैं कि तुम यहां से चले जाओ और उसे यह भी कहते हैं वैसे तो तुम ईश्वर का बहुत नाम लेती हो तो तुम इस बारिश से क्यों डर रही हो तुम ईश्वर के भरोसे ही हमारे घोसले से बाहर निकल जाओ।

इस पर बेचारी मैना को वहां से धक्के मारकर भगा दिया जाता है। मैना भटकते हुए एक आम के पेड़ पर जा पहुंचती है। वही वह खुद को सुरक्षित रखती है रात भर ओले पड़ते हैं। कौवे काय काय करते हुए यहां से वहां भटकते हैं कुछ कौवे तो मर भी जाते हैं।


आम के पेड़ से एक बड़ी टहनी टूटती है और पेड़ के तले में जाकर एक जगह बनाती है और उसी जगह पर मैना रात बिताती है। इसी प्रकार मैना सुरक्षित बच जाती है। अगली सुबह धूप चमकती है और मैना ईश्वर का धन्यवाद करती हुई वहां से उड़ जाती है।

रास्ते में उसे घायल और मारे हुए कौवे मिलते है उनमें से एक कौवा मैना से पूछता है आखिर तुम नन्ही सी जान कैसे जीवित बची इतने भयंकर तूफान से। मैना ने कहा मैं रातभर ईश्वर से प्रार्थना करती रही और उन्होंने ही मेरी रक्षा की है और जो मैं आज आपके सामने जीवित खड़ी हूं यह सब ईश्वर की मेहर हैं।
तो दोस्तों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि “दुःख में पड़े और असहाय जीव को ईश्वर के अलावा कोई नहीं बचा सकता। इसलिए अपने दुःख में या सुख में हमेशा ईश्वर को ही याद करना चाहिए”।







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