Motivational Poem in Hindi जो भर देंगी आप में उत्साह

 Motivational Poem in Hindi जो भर देंगी आप में उत्साह

Motivational poems हमारे हृदय में उत्साह और प्रोत्साहन भरती है। Motivational Poem in Hindi के इस ब्लॉग में महान लोगों के द्वारा लिखी गई मोटिवेशनल पोएम इन हिंदी दी गई है जो आपको अपने जीवन में हताश होने पर motivate करेंगी। महान लोगों की यह most important motivational poems आपके जीवन में आनंद भरेगी और आपको सफलता की ओर अग्रसर करेगी। तो आइए देखते हैं महान लोगों के द्वारा लिखी गई Motivational poems in Hindi जो नीचे दी गई है-


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मोटिवेशनल कविताएं क्या होती हैं?

Motivational Kavita in Hindi के इस ब्लॉग में आप जानेंगे कि मोटिवेशनल कविताएं क्या होती है। तो आईये आपको बताते हैं कि यह वह कविताएं होती हैं जो व्यक्ति को अपने लक्ष्य को पाने में सहायता करती हैं। इस प्रकार की कविताएं व्यक्ति में एक नई उम्मीद भी भर देती हैं। प्रेरणादायक प्रसिद्ध हिंदी कविताएँ निम्नलिखित है।



हरिवंश राय बच्चन: Motivational Poems in Hindi 


कविवर हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर सन 1907 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1942-1952 ई० तक यहीं पर प्राध्यापक रहे। 1976 ई० में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया गया। उनका निधन 2003 ई० में मुंबई में हुआ था।


हरिवंश राय बच्चन की कविताएं

  हरिवंश राय बच्चन की कविताएं इस प्रकार से है :


जो बीत गई -हरिवंश राय बच्चन 


जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में एक सितारा था

माना, वह बेहद प्यारा था,

वह डूब गया तो डूब गया;

अंबर के आनन को देखो,

कितने इसके तारे टूटे,

कितने इसके प्यारे छूटे,

जो छूट गए फिर कहाँ मिले;

पर बोलो टूटे तारों पर

कब अंबर शोक मनाता है!

जो बीत गई सो बात गई!


जीवन में वह था एक कुसुम,

थे उस पर नित्य निछावर तुम,

वह सूख गया तो सूख गया;

मधुवन की छाती को देखो,

सूखीं कितनी इसकी कलियाँ,

मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ जो

मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं;

पर बोलो सूखे फूलों पर

 कब मधुवन शोर मचाता है;

जो बीत गई सो बात गई!


जीवन में मधु का प्याला था,

तुमने तन-मन दे डाला था,

वह टूट गया तो टूट गया;

मदिरालय का आँगन देखो,

कितने प्याले हिल जाते हैं,

गिर मिट्टी में मिल जाते हैं,

जो गिरते हैं कब उठते हैं;

पर बोलो टूटे प्यालों पर

कब मदिरालय पछताता है!

जो बीत गई सो बात गई!


मृदु मिट्टी के हैं बने हुए,

मधुघट फूटा ही करते हैं,

लघु जीवन लेकर आए हैं,

प्याले टूटा ही करते हैं,

फिर भी मदिरालय के अंदर

 मधु के घट हैं, मधुप्याले हैं,

जो मादकता के मारे हैं

वे मधु लूटा ही करते हैं;

वह कच्चा पीने वाला है

 जिसकी ममता घट-प्यालों पर,

जो सच्चे मधु से जला हुआ

 कब रोता है, चिल्लाता है!

जो बीत गई सो बात गई!


 हरिवंश राय बच्चन सांत्वना देते रिश्तों की नाजुक अवस्था का वर्णन करते हुए यह बताना चाहते हैं कि संसार में हर रिश्ता एक ना एक दिन समाप्त होना ही है। यह अस्थाई है इस पर किसी का जोर नहीं है। इसमें कवि हरिवंश राय बच्चन अनेक उदाहरण देकर कहते हैं कि जो बीत गई सो बात गई।



दिन जल्दी-जल्दी ढलता है -हरिवंश राय बच्चन 


दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

हो जाय न पथ में रात कहीं,

मंज़िल भी तो है दूर नहीं

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगॆ

 यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊँ किसके हित चंचल?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


भावार्थ – इसमें कवि हरिवंश राय बच्चन पथिक के थके होने के बावजूद उमंग और उत्साह की बात करता है। जब पथिक घर लौटता है बहुत थका हुआ होता है लेकिन अपनों से मिलने की चाहत उसे जल्दी जल्दी चलने के लिए उत्साहित करती है। पथिक यही सोच कर चलता है की मंजिल बस आने ही वाली है और वह निरंतर चलता रहता है। इसी भावार्थ के साथ कवि हरिवंश राय बच्चन कहते हैं-दिन जल्दी जल्दी ढलता है।



रवीन्द्रनाथ टैगोर: Motivational Poem in Hindi


जीवन परिचय– रवींद्रनाथ टैगोर(7मई1861-07 अगस्त 1941)विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला’ गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।


मन जहां डर से परे है

“मन जहां डर से परे है और सिर जहां ऊंचा है;

ज्ञान जहां मुक्त है और जहां दुनिया को

संकीर्ण घरेलू दीवारों से छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;

जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं, जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें

त्रुटि हीनता की तलाश में हैं, जहां कारण की स्पष्ट धारा है

जो सुनसान रेतीले मृत आदत के,वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है;

जहां मन हमेशा व्यापक होते विचार और सक्रियता में, तुम्हारे जरिए आगे चलता है

और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है,ओ पिता परमेश्वर

मेरे देश को जागृत बनाओ”

भावार्थ- रवींद्रनाथ टैगोर ने इस कविता में सपनों के भारत का वर्णन किया है। इसमें कवि ऐसे भारत का वर्णन कर रहे हैं जिसमें कोई भी अपने स्वार्थ के लिए झूठ ना बोले। जहां ज्ञान को जाति और धर्म के नाम पर बांटा ना जाए। आजादी के बाद जो भारत किस सोच में बदलाव हो गया है सब अपने स्वार्थ के लिए जिंदा है यह सब भाव और अपने मन से हीनता का भाव भुला भुला दो मेरे देश के वासियों यह कवि कहना चाहते हैं।



प्रदीप: Motivational Poem in Hindi


 कवि परिचय- कवि प्रदीप (6 फ़रवरी 1915 – 11 दिसम्बर 1998) भारतीय कवि एवं गीतकार थे जो देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों की रचना के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में ये गीत लिखा था। लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया।


हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के | प्रदीप 

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के

पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के

अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के

 मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के

 सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के

 हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के

 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के


तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के

इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

 देखो कहीं बरबाद न होवे ये बगीचा 

 इसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा

 रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के

 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

 दुनियाँ के दांव पेंच से रखना न वास्ता 

मंजिल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता 

 भटका न दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के

 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

एटम बमों के जोर पे ऐंठी है ये दुनियाँ 


 बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनियाँ

 तुम हर कदम उठाना जरा देखभाल के

 इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो 

सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो 

अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों 

उठो छलांग मार के आकाश को छू लो

तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के 

इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के

भावार्थ-इसमें कवि प्रदीप जी ने अपने देश के प्रति देश भक्ति और प्रेम को प्रदर्शित किया है। इस कविता में युवाओं के मन में देशभक्ति जागृत करने का भाव प्रकट होता है। कि देश के नए युवा उठे और देश की रक्षा के लिए समर्पण भाव अपने मन में जागृत करें।


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